यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया है. कोर्ट ने कहा कि नई सुनवाई तक अभी 2012 के नियम ही लागू रहेंगे. नए नियमों पर स्टे लगाने के साथ ही सीजेआई ने नए फैसलों को लेकर कई तीखी टिप्पणी भी की है. इस दौरान कोर्ट ने कहा है कि आजादी के 75 साल बाद जातिखानों से मुक्त नहीं कर पा रहे हैं और ऐसे फैसले हमें पीछे लेकर जा रहे हैं. साथ ही कोर्ट ने कहा कि इसका दुरुपयोग हो सकता है. वहीं कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख मुकर्रर की है.
प्रमुख बातें जो सुप्रीम कोर्ट ने कही,
- 2026 के UGC इक्विटी रेगुलेशंस को फिलहाल लागू न किया जाए।
- ये नियम प्रथम दृष्टया “अस्पष्ट” हैं और “दुरुपयोग की आशंका” रखते हैं।
- नियमों की पुनर्समीक्षा एक छोटी समिति करे, जिसमें प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हों।
- क्या रेगुलेशन ऐसी स्थितियों में भी भेदभाव को कवर करेगा, जहाँ जाति पहचान स्पष्ट न हो (जैसे भौगोलिक आधार पर अपमान)?
- नियमों में यह मानकर क्यों चला जा रहा है कि सिर्फ जाति-आधारित भेदभाव ही है; अन्य आधारों पर भी उत्पीड़न होता है?
- क्या हम जातिविहीन समाज की दिशा में जो हासिल किया, उससे पीछे जा रहे हैं?
- अलग-अलग जातियों के अलग हॉस्टल वाले विचार पर – “भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए… हम सब साथ रहते थे।”
- शैक्षणिक संस्थानों में भी भारत की एकता झलकनी चाहिए।
- जब 3(e) पहले से “भेदभाव” कवर करता है, तो 3(c) की जरूरत क्यों? क्या यह दोहराव/रेडंडेंसी नहीं?
- अगर 2012 के नियम ज्यादा समावेशी थे तो 2026 में पीछे क्यों जाना; नियमों में रैगिंग को क्यों नहीं लिया?

