रायपुर।
राज्य में सेवानिवृत्त अधिकारी वर्ग आज अपने सबसे बुनियादी अधिकार पेंशन के लिए भटकने को मजबूर है। न मांग–न जांच प्रमाणपत्र (No Demand–No Enquiry Certificate) के नाम पर पेंशन भुगतान रोके जाने से सैकड़ों सेवानिवृत्त अधिकारी महीनों से आर्थिक संकट और मानसिक पीड़ा झेल रहे हैं। यह स्थिति अब एक सुनियोजित “पेंशन रोको नीति” का रूप लेती जा रही है।
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ, छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रांताध्यक्ष श्री वीरेन्द्र नामदेव ने इस गंभीर स्थिति पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मंत्रालय स्तर पर प्रमाणपत्र जारी करने में जानबूझकर विलंब किया जा रहा है। इससे पहले विभागाध्यक्ष कार्यालयों द्वारा प्रकरणों को समय रहते मंत्रालय नहीं भेजा जाता और संबंधित कार्यरत कार्यालय भी उदासीन रवैया अपनाए रहते हैं, जिसका सीधा खामियाजा सेवानिवृत्त अधिकारी भुगत रहे हैं।
श्री नामदेव ने कहा कि जब न किसी प्रकार का लेन-देन शेष है, न कोई विभागीय जांच लंबित है और न ही किसी तरह की मांग बाकी है, तब भी न मांग–न जांच प्रमाणपत्र प्राप्त करना पेंशनर्स के लिए “टेढ़ी खीर” बना दिया गया है। यह प्रक्रिया अब औपचारिकता नहीं, बल्कि पेंशन रोकने का औजार बन चुकी है।
प्रांताध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में सवाल उठाया कि—
क्या 30–35 वर्ष तक शासन की ईमानदारी से सेवा करने वाले अधिकारी का यही पुरस्कार है?
क्या सेवा निवृत्ति के बाद सम्मानजनक जीवन जीना उसका अपराध हो गया है?
और क्या पेंशन जैसे संवैधानिक अधिकार को फाइलों में दबाकर छीना जा सकता है?
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही न मांग–न जांच प्रमाणपत्र जारी कर लंबित पेंशन प्रकरणों का निराकरण नहीं किया गया, तो महासंघ को मजबूरन राज्यव्यापी आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। इसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी शासन, मंत्रालय तथा संबंधित विभागों की होगी।
महासंघ ने स्पष्ट किया कि पेंशन कोई कृपा नहीं, बल्कि जीवन भर की सेवा का अधिकार है। इस अधिकार से वंचित करना न केवल अन्याय है, बल्कि सेवानिवृत्त अधिकारी वर्ग के आत्मसम्मान पर सीधा हमला है, जिसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

